बुधवार, 30 मार्च 2011
लोकतांत्रिक मूल्यों में थी नेहरू की आस्था: रविंद्रा
यमुनानगर। पंडित जवाहर लाल नेहरू की लोकतंत्र और लोकतांत्रिक मूल्यों में आस्था थी। आधुनिक भारत के निर्माण में उनका अतुल्नीय योगदान है। उक्त शब्द चौधरी चरण सिंह विश्वविद्यालय मेरठ के पूर्व उप कुलपति पदमश्री डा. रविंद्रा कुमार ने डीएवी गल्र्स कालेज के नेहरू स्टडी सेंटर द्वारा नेहरू और समाजवाद विषय पर आयोजित राष्ट्रीय संगोष्ठी के दौरान कहे। कार्यक्रम की अध्यक्षता कालेज प्रिंसिपल डा. सुषमा आर्य ने की।
डा. रविंद्रा कुमार ने कहा कि राष्ट्रीय एकीकरण में नेहरू के योगदान को कभी भूलाया नहीं जा सकता। देश के पुन:निर्माण में पंडित नेहरू जी का योगदना समर्णिय है। किसी भी महान व्यक्ति के विचारों को पूर्वाग्रह से देखा जाता है। लेकिन हमें परिस्थितियों के अनुसार ही उनके विचारों का अपनाना चाहिए। देश के विकास के लिए उन्होंने टीम के रुप में कार्य किया। आज लोकतांत्रिक मूल्यों का ह्रास हो रहा है। जो कि गलत है।
गांधी मैमोरियल म्यूजियम एंड गांधी लाइब्रेरी नई दिल्ली के डिप्टी डायरेक्टर प्रोफेसर अनिल मिश्रा ने कहा कि हम विड़ंबनाओं के देश में रह रहे हैं और नेहरू जी विड़ंबनाओं को खतम करने की कौशिश की थी। नेहरू के सामने आजादी के दौरान कितनी चुनौतियां थी, इस बात का अंदाजा इससे लगाया जा सकता है कि अगर पाकिस्तान नहीं बनता, तो आज हिंदूस्तान के अनेक टूकड़े हो गए होते। सरदार पटेल के एक पत्र से खुलासा हुआ है कि देश के विभाजन में पटेल, नेहरू व जिन्ना शामिल थे। नेहरू का उद्देश्य भारत को लोकतांत्रिक बनाना था। इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ मेडिकल साइंस, आईआईटी, बाखड़ा डैम, इत्यादि सभी नेहरू जी की देन है। नेहरू ने देश में विज्ञान व कला को बढ़ाया दिया। लेकिन आज हम आजाद भारत के गुलाम नागरिक है।
कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय राजनीति शास्त्र विभाग के चेयरमैन प्रोफेसर आरएस यादव ने कहा कि नेहरू के विचारों में पूंजीवादी व माक्र्सवादियों का मिश्रण था। नेहरू सामाजिक बदलाव तो चाहते थे, लेकिन वे क्रांति के खिलाफ थे। नेहरू का समाजवाद अंतर्राष्ट्रीय स्थिति से जुड़ा हुआ है। नेहरू की सोच थी कि आखिरी आदमी तक योजना का लाभ पहुंचना चाहिए। तभी समाजवाद की सार्थकता सिद्ध होगी।
दिल्ली विश्वविद्यालय के प्रोफेसर हिमांशु राय ने बताया कि वर्ष १९६२ में जब लोकसभा सत्र के दौरान अटल बिहारी बाजपेयी ने नेहरू जी की आलोचना की थी, तो तब नेहरू ने कहा था कि वह भविष्य का प्रधानमंत्री है। नेहरू जी की दूरदृष्टि थी। उन्होंने कृषि के विकास के लिए कारगर कदम उठाए। नरेगा अब लागू हुआ है, जिसकी बात उन्होंने वर्षों पहले की थी। राइट टू फूड एक्ट, रोजगार का अधिकार इन सबकी की शुरूआत नेहरू जी ने बहुत पहले कर दी थी।
एचआईआईआरडी नीलोखेड़ी के डायरेक्टर प्रोफेसर रणबीर सिंह ने कहा कि नेहरू जी द्वारा बनाए गए पब्लिक सेक्टर का लाभ पूंजीपतियों को मिला। जिस कारण उस समय अमीरों व गरीबों के बीच खाई बढ़ गई। अपने प्रधानमंत्री कार्यकाल में उन्होंने भूमि सुधार पर ध्यान दिया, लेकिन राज्यों के मुख्यमंत्रियों की वहज से सुधार नहीं हो पाया। नेहरू ने साम्यवादियों व समाजवादियों को साथ नहीं जोड़ा। समाजवादी नेहरू को समाजवादी नहीं मानते थे और पूंजीवादी उन्हें समाजवादी कहते थे। आज के बदलते युग में नेहरू जी के विचार उतने ही प्रासांगिक है, जितने उस समय थे।
पंजाब यूनिवर्सिटी चंडीगढ़ के सेवानिवृत प्रोफेसर पीएस वर्मा ने कहा कि जमींदारी प्रथा को खतम करने में नेहरू जी का योगदान था। वे मानते थे कि बड़े उद्योगों पर सरकार का कब्जा हो, ताकि अधिक से अधिक लोगों को रोजगार मिल सकें। पंजाब यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर मनीष शर्मा ने इंटरनेशनल टैरिज़म व इंवायरमेंट क्लाइमेट्स चेंज पर विचार प्रकट किए। उन्होंने कहा नेहरू नवभारत का निर्माण करना चाहते थे। पंजाब यूनिवर्सिटी की प्राध्यापिका कनुप्रिया ने अंतर्राष्ट्रीय संबंधों में नेहरू की भूमिका पर विस्तार से प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि प्रत्येक देश का कोड ऑफ कंडक्ट होना चाहिए। नेहरू स्टडी सेंटर के इंचार्ज प्रोफेसर मलकीत सिंह ने सभी का आभार व्यक्त किया। डा. आर्य ने कहा कि इस प्रकार के आयोजनों से छात्राओं के ज्ञान में वृद्धि होती है।
गांधी मैमोरियल म्यूजियम एंड गांधी लाइब्रेरी नई दिल्ली के डिप्टी डायरेक्टर प्रोफेसर अनिल मिश्रा ने कहा कि हम विड़ंबनाओं के देश में रह रहे हैं और नेहरू जी विड़ंबनाओं को खतम करने की कौशिश की थी। नेहरू के सामने आजादी के दौरान कितनी चुनौतियां थी, इस बात का अंदाजा इससे लगाया जा सकता है कि अगर पाकिस्तान नहीं बनता, तो आज हिंदूस्तान के अनेक टूकड़े हो गए होते। सरदार पटेल के एक पत्र से खुलासा हुआ है कि देश के विभाजन में पटेल, नेहरू व जिन्ना शामिल थे। नेहरू का उद्देश्य भारत को लोकतांत्रिक बनाना था। इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ मेडिकल साइंस, आईआईटी, बाखड़ा डैम, इत्यादि सभी नेहरू जी की देन है। नेहरू ने देश में विज्ञान व कला को बढ़ाया दिया। लेकिन आज हम आजाद भारत के गुलाम नागरिक है।
कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय राजनीति शास्त्र विभाग के चेयरमैन प्रोफेसर आरएस यादव ने कहा कि नेहरू के विचारों में पूंजीवादी व माक्र्सवादियों का मिश्रण था। नेहरू सामाजिक बदलाव तो चाहते थे, लेकिन वे क्रांति के खिलाफ थे। नेहरू का समाजवाद अंतर्राष्ट्रीय स्थिति से जुड़ा हुआ है। नेहरू की सोच थी कि आखिरी आदमी तक योजना का लाभ पहुंचना चाहिए। तभी समाजवाद की सार्थकता सिद्ध होगी।
दिल्ली विश्वविद्यालय के प्रोफेसर हिमांशु राय ने बताया कि वर्ष १९६२ में जब लोकसभा सत्र के दौरान अटल बिहारी बाजपेयी ने नेहरू जी की आलोचना की थी, तो तब नेहरू ने कहा था कि वह भविष्य का प्रधानमंत्री है। नेहरू जी की दूरदृष्टि थी। उन्होंने कृषि के विकास के लिए कारगर कदम उठाए। नरेगा अब लागू हुआ है, जिसकी बात उन्होंने वर्षों पहले की थी। राइट टू फूड एक्ट, रोजगार का अधिकार इन सबकी की शुरूआत नेहरू जी ने बहुत पहले कर दी थी।
एचआईआईआरडी नीलोखेड़ी के डायरेक्टर प्रोफेसर रणबीर सिंह ने कहा कि नेहरू जी द्वारा बनाए गए पब्लिक सेक्टर का लाभ पूंजीपतियों को मिला। जिस कारण उस समय अमीरों व गरीबों के बीच खाई बढ़ गई। अपने प्रधानमंत्री कार्यकाल में उन्होंने भूमि सुधार पर ध्यान दिया, लेकिन राज्यों के मुख्यमंत्रियों की वहज से सुधार नहीं हो पाया। नेहरू ने साम्यवादियों व समाजवादियों को साथ नहीं जोड़ा। समाजवादी नेहरू को समाजवादी नहीं मानते थे और पूंजीवादी उन्हें समाजवादी कहते थे। आज के बदलते युग में नेहरू जी के विचार उतने ही प्रासांगिक है, जितने उस समय थे।
पंजाब यूनिवर्सिटी चंडीगढ़ के सेवानिवृत प्रोफेसर पीएस वर्मा ने कहा कि जमींदारी प्रथा को खतम करने में नेहरू जी का योगदान था। वे मानते थे कि बड़े उद्योगों पर सरकार का कब्जा हो, ताकि अधिक से अधिक लोगों को रोजगार मिल सकें। पंजाब यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर मनीष शर्मा ने इंटरनेशनल टैरिज़म व इंवायरमेंट क्लाइमेट्स चेंज पर विचार प्रकट किए। उन्होंने कहा नेहरू नवभारत का निर्माण करना चाहते थे। पंजाब यूनिवर्सिटी की प्राध्यापिका कनुप्रिया ने अंतर्राष्ट्रीय संबंधों में नेहरू की भूमिका पर विस्तार से प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि प्रत्येक देश का कोड ऑफ कंडक्ट होना चाहिए। नेहरू स्टडी सेंटर के इंचार्ज प्रोफेसर मलकीत सिंह ने सभी का आभार व्यक्त किया। डा. आर्य ने कहा कि इस प्रकार के आयोजनों से छात्राओं के ज्ञान में वृद्धि होती है।
समाज को बिल्कुल बर्दाश्त नहीं मूल्यों में गिरावट
मां तो मां, दर्शकों को भी रूला गया मारिया का सच।काश यह झूठ हो, ऐसा नहीं होना चाहिए। क्या ऐसा हो सकता है, यह सवाल हर दर्शक के जेहन में था। रिश्ते की मर्यादा क्या इतनी भी नहीं। या यह पश्चिम की समस्या है। ... नहीं हमारे यहां भी तो ऐसा ही हो जाता है। क्यों, पता नहीं। मां और बेटी दोनों एक से प्रेम करती हैं। पाश्चात्य संस्कृति के रंग में रंगा नाटक मारिया कुछ जगह दर्शकों को विचलित करता नजर आया। डीएवी गल्र्स कालेज में नाटक उत्सव के दौरान जकिया जुबैरी की कहानी ‘मारिया’ का मंचन किया गया। नाटक का निर्देशन इंद्र राज इंदू ने किया। अविवाहित रिश्ता और इससे पैदा हुआ बच्चा। समाज की चिंता हमें ही नहीं उन्हें भी है। वे भी डरते हैं। हमारे यहां ही अविवाहित मां बच्चे को लावारिश छोडऩे के लिए अभिशप्त नहीं है, वहां भी है। यहीं इस नाटक का सार है। अविवाहित मां अपनी बेटी को लावारिश छोड़ देती है। बरसों साथ गुजार दिए सिर्फ इस अहसास के साथ कि कल क्या होगा। जो वो चाहती थी वह नहीं मिला। पे्रमी भी छोड़ कर चला गया। तब जब उसे अपने प्यार के सहारे की जरुरत होती है। कहानी घूम जाती है। मां को बेटी मिलती है जो गर्भवती है। मां अपनी बेटी से पूछती है कि तुमने इतनी बड़ी कुर्बानी किसके लिए दी बेटी। बेटी के मुंह से निकला हुआ संवाद कि मां जिसके पास तुम जाती थी। कहानी घूम जाती है। मां को बेटी मिलती है जो गर्भवती है। मां अपनी बेटी से पूछती है कि तुमने इतनी बड़ी कुर्बानी किसके लिए दी बेटी। बेटी के मुंह से निकला हुआ संवाद कि मां जिसके पास तुम जाती थी। यह संवाद सुनकर दर्शकों को एक ऐसे सच का सामना करना पड़ता है कि शर्म से सिर झुक जाता है।
हम भी पश्चिम में आ गए : कहानी क्योंकि पश्चिम परिवेश की है। ऐसे में पात्रों की ड्रेस भी वहां के अनुरुप थी। सबसे बड़ी बात तो यह रही कि पात्रों की भावभंगिमाएं भी पूरी तरह से पाश्चात्य रंग में रंगी हुई थीं। यहीं वजह रही कि वे अपनी बात को बहुत ही करीने से कह गए।
हमारी भी समस्या है : नाटक के निदेशक इंद्रराज इंदू ने बताया कि मारिया नाटक आज के समय में बहुत प्रासंगिक है। हम रोजमर्रा की जिंदगी में ऐसे बहुत सारे उदाहरण हमारे सामने हैं। समाज में खुलापन आ रहा है। इसके साथ ही इस तरह की दिक्कत भी आएगी। इससे बच नहीं सकते।
जाकिया जुबैरी एक परिचय : पाकिस्तान मूल की जाकिया जुबैरी लंबे समय से इंग्लैंड में रह रही है। वह वहां की राजनीति में सक्रिय है। हिंदी से जुड़ी जाकिया जुबैरी पश्चिम में भी मूल्य तलाशती हैं। उनका कहना है कि मूल्यों की गिरावट किसी एक समाज की समस्या नहीं, हर समाज की दिक्कत है।
लिखो हिंदी पाओ पंजाबी
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http://h2p.learnpunjabi.org/default.aspx
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ਲਿਖੋ ਹਿੰਦੀ ਵਿੱਚ ਪੜੋ ਪੰਜਾਬੀ ਵਿੱਚ : ਚਾਹੇ ਹਿੰਦੀ ਵਿੱਚ ਲਿਖੇ ਹੋਏ ਪੰਜਾਬੀ ਵਿੱਚ ਪੜੇ ਜਾਣ ਦੀ ਗੱਲ ਹਜ਼ਮ ਨਹੀਂ ਹੋਵੇ ਪਰ ਹੈ ਬਿਲਕੁੱਲ ਸੱਚ । ਕੰਪਿਊਟਰ ਦੇ ਦੁਆਰੇ ਅਜਿਹਾ ਕਰਣਾ ਬਿਲਕੁੱਲ ਸੰਭਵ ਹੋ ਗਿਆ ਹੈ । ਇਹ ਸਾਫਟਵੇਯਰ ਹਿੰਦੀ ਵਿੱਚ ਲਿਖੇ ਹੋਏ ਵਿਸ਼ਾ ਨੂੰ ਪੰਜਾਬੀ ਵਿੱਚ ਅਨੁਵਾਦ ਕਰਕੇ ਪੜ੍ਹਨੇ ਦੀ ਸਹੂਲਤ ਦਿੰਦਾ ਹੈ । ਇਸ ਦੇ ਨਾਲ ਹਿੰਦੀ ਤੋਂ ਅਨਜਾਨ ਪੰਜਾਬੀ ਪਾਠਕ ਕਿਸੇ ਹਿੰਦੀ ਕਿਤਾਬ ਜਾਂ ਲੇਖ ਆਦਿ ਨੂੰ ਇੱਕ ਝਟਕੇ ਵਿੱਚ ਪੰਜਾਬੀ ਵਿੱਚ ਬਦਲਾ ਵੇਖ ਸੱਕਦੇ ਹਨ । ਇਸ ਸਾਫਟਵੇਯਰ ਦੀ ਇੱਕ ਵਿਸ਼ੇਸ਼ਤਾ ਇਹ ਵੀ ਹੈ ਕਿ ਤੁਸੀ ਹਿੰਦੀ ਵਿੱਚ ਟਾਈਪ ਕੀਤੇ ਮੁੱਦਾ ਨੂੰ ਸਿੱਧਾ ਈ - ਮੇਲ ਕਰ ਸੱਕਦੇ ਹੋ । ਜੇਕਰ ਉਪਭੋਗਤਾ ਚਾਹੇ ਤਾਂ ਹਿੰਦੀ ਦੇ ਮੁੱਦੇ ਨੂੰ ਅਨੁਵਾਦ ਕਰਕੇ ਪੰਜਾਬੀ ਵਿੱਚ ਵੀ ਈ - ਮੇਲ ਕੀਤਾ ਜਾ ਸਕਦਾ ਹੈ ।
मंगलवार, 29 मार्च 2011
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