Monday, May 2, 2011

दिल्‍ली में ब्‍लॉग जगत - दूरियां बनी नजदीकियां

तारीख : 30 अप्रैल, 2011
दिन : शनिवार 

समय : सुबह के 4 बजे।
सुबह के 4 बजे से पहले भी कई बार उठ गया। ऐसा मन में आ रहा था कहीं अलार्म सुनाई ना दिया हो और मैं सोता ही रह जाउं और दिल्‍ली जाने वाली टृेन जिसकी मैंने 20 दिन पहले ही बुकिंग करवा दी थी, छुट ना जाए।  लेकिन 4 बजे तक अलार्म के बजने से पहले हीअलार्म बंद कर उठ खड़ा हुआ और दिल्‍ली को कह दिया- मैं आ रहा हूं दिल्‍ली।

समय : सुबह के साढे 6 बजे।
श्री श्रीश शर्मा 'ई-पंडित' का फोन आता है, कहां हो रविंद्र जी।
मैंने कहा कि आपके सामने पहुंच रहा हूं दो मिंट में। लेकिन एक मिंट में ही मैं उनके सामने प्रत्‍यक्ष खड़ा था अपनी बाईक पर। हम दोनों ने रेल का टाईम कंफर्म किया, जोकि 10 मिंट लेट थी। 

समय : सुबह के 7 बजे।
इतने में ही उमेश वत्‍स जी का फोन आता है कि शालीमार एक्‍सप्रेस 'जिस गाड़ी से हमने दिल्‍ली तक का सफर तय करना था' स्‍टेशन की तरफ बढ़ रही है। आपको मैं बता दूं कि अगर आप अंबाला से वाया जगाधरी, दिल्‍ली जाना चाहते हैं तो रास्‍ते में जगाधरी वर्कशाप का स्‍टेशन आता है और वत्‍स जी भी वहीं से गाड़ी में सवार हो चुके थे, जोकि अब वो भी हमारे साथ दिल्‍ली जा रहे थे, देश भर से आने वाले ब्‍लॉगरों से मिलने के लिए। गाड़ी स्‍टेशन पर आ चुकी थी और हम भी सवार हो गये इस पर। 

समय : सुबह के 7 बजे साढे 11 बजे। 
गाड़ी पर बैठने के बाद सिलसिला शुरू हुआ वत्‍स जी की कविताओं से। दिल्‍ली तक पहुंचते पहुंचते उन्‍होंने दो कविताएं लिख डाली और लगभग पांच कविताएं भी सुनाई, जोकि देश-भक्ति से लबरेज थी। श्रीश जी ने भी अपने सॉफटवेयर बारे चर्चा की। मैं भी भला क्‍यों पीछे रहता, वो एक कहते मैं दो बताता। हमारे साथ बैठे लोगों ने भी हमारी बातों में सवाद लेना शुरू किया। दिल्‍ली तक का सफर कैसे बीत गया, पता ही नहीं हम

समय : सुबह के साढे 11 बजे। 
हमने दिल्‍ली रेलवे पर कदम रखा, तो सीधे मैटरो की तरफ लपके, क्‍योंकि श्रीश जी ने मिनी लैपी जो खरीदना था। तो पहुंच गये कंप्‍यूटर मार्किट नेहरू प्‍लेस। फिर शुरू हुआ सिलसिला मित्रों को फोन करने का, कि तुमने जो सामान मंगवाया था वह इस रेट पर है लाना है तो बताओ। बहुत दुकानें घूमें पर मन की तसल्‍ली नहीं हुई और हम बिना लैपी के ही प्रगति मैदान मैटरो स्‍टेशन पर पहुंच गये। किस्‍मत अच्‍छी थी कि अविनाश वाचसपति को फोन किया और उन्‍होंने बताया कि वे आसपास ही हैं और हिंदी साहित्‍य भवन ही जा रहे हैं। जैसे ही वो अपनी गाडी के साथ पहुंचे, तो हम तीनों ने उस पर कब्‍जा जमा लिया।


समय : दोपहर के साढे 3  बजे। 
हम अपने गणतव्‍य पर पहुंच चुके थे। जैसे ही हमने भवन के अंदर कदम रखा, तो वहां चारों और रखी साहित्यिक किताबों में खो गये, जलपान ग्रहण किया। अब शुरू हुआ सिलसिला जानने-पहचानने का। सबसे पहले नजर आये प्रमोद तांवर जी, जिनसे ब्‍लॉग की दुनियां में बहुत बार बातचीत हुई हैं, मतलब ब्‍लॉग फ्रेंडस। मैंने जाकर उनको कहा कि आप प्रमोद जी, उन्‍होंने कहा कि हां। बस फिर ढेरों बाते। इतने में लंबी-लंबी मूछों वाले एक शख्‍स ने ध्‍यान खींचा, तो मैंने मौका ना लपककर उनकी तरफ हाथ बढाया और कहा ललित शर्मा जी। वो मुस्‍कुराये और कहा हां भाई। फिर गिरी राज जी से मिलकर मैंने कहा कि पहचाना आपने। मैं रविंद्र, इतना कहते ही वो कहने लगे पुंज। फिर तो सिलसिला तब तक चलता रहा, जब तक श्री श्रीश जी को मंच पर ब्‍लॉगिंग पर बोलने के लिए नहीं बुलाया गया। फिर नंबर आया वत्‍स जी का। उन्‍होंने बैठे-बैठे उस दिन पर कविता ही बना डाली और संजोग देखो, अविनाश वाचस्‍पति जी ने उनको कुछ बोलने के लिए बुला भी लिया।


समय : अब ना समय पूछो, पता ही नहीं चला समय का तो, जैसे पंख लगाकर फुर हो गया। 
उत्‍तरा्तराखंड के मुख्यमंत्री रमेश पोखरियाल ‘निशंक’ का आगमण होता है। उन्‍होंने दीप प्रज्वलित कर कार्यक्रम का विधिवत शुभारंभ रमेश पोखरियाल ‘निशंक’ ने किया। तत्पश्चात् अविनाश वाचस्पति और रवीन्द्र प्रभात द्वारा संपादित हिन्दी ब्लॉगिंग की पहली मूल्यांकनपरक पुस्तक ‘हिन्दी ब्लॉगिंग : अभिव्यक्ति की नई क्रांति’, रवीन्द्र प्रभात का नया उपन्यास ‘ताकी बचा रहे लोकतंत्र’, निशंक जी की पुस्तक ‘सफलता के अचूक मंत्र’ तथा रश्मिप्रभा द्वारा संपादित   परिकल्पना की त्रैमासिक पत्रिका ‘वटवृक्ष’ का लोकार्पण किया गया। इसके बाद चौंसठ हिंदी ब्लॉगरों का सारस्वत सम्मान हुआ। इस अवसर पर प्रमुख समाजसेवी विश्वबंधु गुप्ता ने कहा कि जीवन के उद्देश्य ऐसे होने चाहिए कि जिसमें मानवीय सेवा निहित हो।
इस अवसर पर निशंक जी उन्होंने परिकल्पना डॉट कॉम की ओर से देश विदेश के इक्यावन चर्चित और श्रेष्ठ तथा नुक्कड़ डॉट कॉम की ओर से हिंदी ब्लॉगिंग में विशिष्टता हासिल करने वाले तेरह ब्लॉगरों को सारस्वत सम्मान प्रदान किया।
चाय-पानी के छोटे से ब्रेक के बाद राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय के छात्रों ने कालजयी साहित्यकार रविन्द्र नाथ टैगोर की बंगला नाटिका लावणी का हिंदी रूपांतरण प्रस्तुत कर सभागार में उपस्थित दर्शकों को मन्त्र मुग्ध कर दिया। इस अवसर पर हिंदी साहित्य निकेतन की 50 वर्षों की यात्रा को आयामित कराती पावर पोईन्ट प्रस्तुति भी हुई। इस अवसर पर रात्रि भोज का भी आयोजन था। रात को ठहरने की भी व्‍यवस्‍था थी।
अगले दिन हमने वहां नाश्‍ता किया और फिर से श्रीशजी और वत्‍स जी शुरू हो गये लैपी की खोज में। वाचस्‍पति जी ने भी फोन घुमाये और एक परिचित की मदद से श्रीशजी को एक मिनी दिलवा दिया। फिर उसी शालीमार में दोपहर साढे 3 बजे सवार होकर वापिस घर के लिए रवाना हो गये।
सारे कार्यक्रम के दौरान ऐसा लगा, मानों हम एक ही फैमिली में बैठे हैं। सब एक दूसरे को जानते हैं और बहुत पुरानी जान-पहचान है। कार्यक्रम के सफल आयोजन के लिए आयोजकों को बधाई और भगवान से प्रार्थना, कि अगले वर्ष इससे भी अच्‍छा कार्यक्रम करने के लिए उनको आर्शीवाद और मार्गदर्शन दें। 


3 comments:

  1. बढ़िया विवरण सुनाया फिर कहते थे मुझे लिखना नहीं आता, इतना रोचक तो लिखा है। हम भी अपनी कविता यहाँ डाल दिये हैं।

    हिन्दी भवन दिल्ली में आयोजित परिकल्पना सम्मान समारोह पर एक काव्यमयी नजर

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  2. मैंने आपको देखा था। यह बात और है कि बातचीत का सुयोग नहीं बना।

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  3. koi baat nahi sir,
    next time mil lenge...
    nice to see u on this blog,
    thanks for your visit...

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टिप्पणी के लिये धन्यवाद।