Saturday, October 1, 2011

सिनेमा की सशक्त अभिव्‍यक्ति का माध्‍यम है विजुवल : अमित शरण

यमुनानगर। विजुवल के जरिए अभिव्यक्ति का सबसे सशक्त माध्यम सिनेमा है। लेकिन वो अभिव्यक्ति क्या हो, यह ज्यादा महत्वपूर्ण है। उक्त शब्द जमशेदपुर से आए फिल्म मेकर अमित शरण ने डीएवी गल्र्स कालेज में चतुर्थ हरियाणा फिल्म समारोह के दौरान चलाए जा रहे फिल्म मेकिंग कोर्स के पहले दिन विद्यार्थियों को संबोंधित करते हुए कहे।
शरण ने कहा कि क्रिएटीविटी और जीविका के बीच कैसे बैलेंस बनाया जाए, यह एक आर्ट है। वर्कशाप के दौरान पहले दिन विद्यार्थियों को सिनेमा क्या है, क्यों सिनेमा बनाएं, सिनेमा बनाने के लिए विषय कैसे चुनें और फिर कैसे उसके आर्थिक पहलू को संबोधित करें, इन सभी के बारे में विस्तार से जानकारी दी। उन्होंने कहा कि सिनेमा विजुवल का माध्यम है, बाकि सारी चीजें उसे सपोर्ट करती है, चाहे वह साउंड हो या फिर इफेक्टस, सिनेमा बनाने के लिए विजुवल्स में यकीन होना जरुरी है। सिनेमा के लिए विषय का चुनाव या कहानी का चुनाव आप अपने व्यक्तित्व के हिसाब से करते हैं। इसलिए अपने व्यक्तित्व पर काम करना जरुरी है। दूसरी सबसे जरुरी चीज है, संवेदनशीलता। सिनेमा के अलग-अलग वर्ग है, जैसे डाक्युमेंट्री, फिक्शन, म्यूजिक वीडियो या फिर समाचार। संवेदनशीलता इन सबसे बीच एक धागे की तरह हैं, जो क्रिएटीविटी को विजुवल्स के साथ पिरो देती है।
शरण ने विद्यार्थियों को बताया कि सिनेमा के लिए कहानियां अधिकतर साहित्य से या वास्तविक जिंदगी से ली जाती है। कोई कहानी या नोवल पढ़ते समय पाठक उसका निर्देशक खुद होता है। लेकिन जब हम सिनेमा बनाते हैं, तो वही कहानी दर्शकों के पास निर्देशक के हिसाब से पहुंचती है। कहानी के चरित्र और उसका परिवेश, निर्देशक अपनी सोच के हिसाब से फिर से रचता है। यह जरुरी है कि कहानी को सिनेमा बनाते समय उसके चरित्र और परिवेश को वास्तविक कहानी के आसपास रखा जाए। सिनेमा बनाने के लिए कैमरा, एडिटिंग और साउंड सिर्फ टूल्स हैं। माध्यम महत्वपूर्ण है, टूल्स नहीं। सिनेमा बनाने के बदलते परिवेश में मुंबईया फिल्मों से अलग हटकर फिल्में भी अब व्यक्तिगत अभिव्यक्ति का सशक्त माध्यम बनती जा रही है। बदलती हुई तकनीक जहां हाई डेफिनेशन फॉरमेट्स सिनेमा घरों तक पहुंचने लगे हैं, जिनका खर्च ३५ एमएम सिनेमा के प्रोडक्शन से बहुत कम है। वहां कहानी और अभिव्यक्ति सबसे ज्यादा महत्वपूर्ण होती है। महंगी तकनीक के बहाने सिनेमा को बहुत सालों तक व्यापार और कुछ प्रोडक्शन हाऊसेज़ तक सीमित रखा गया। अब सिनेमा बनाने और दिखाने की स्वतंत्रता पहले से बहुत अधिक बढ़ गई है। अब पैसा सिनेमा की अभिव्यक्ति के बीच आड़े नहीं आता। इसके लिए जरुरी है, कि कैमरा और एडीटिंग जैसे टूल्स पर बखुबी आपका अधिकार हो। कैमरा कहानी का हिस्सा हो, ना कि किसी कहानी को कहने के दौरान कैमरा दिख जाए। अर्थात अच्छी फिल्मों में सिर्फ कहानी दिखती है, कैमरा और एडीटिंग नहीं दिखाता। इसके लिए जरुरी है, कैमरामैन का विश्वास कहानी में हो और कैमरा उसके दिमाग और शरीर का हिस्सा हो। एडीटिंग भी सिनेमा का एक ऐसा पहलु है, जिसमें जितने कम इफेक्टस का इस्तेमाल हो, उतना बेहतर है। सिंपल कट्स से कहानी में जो बात बनकर आती है, वो हजारों इफेक्ट्स और चालाकी भरे दांव-पेंचों से नहीं बनती। यह भी समझना जरुरी है कि वो व्यक्ति सबसे बेहतर क्या कर सकता है। इसे समझने के लिए एक अनुभव हेल्पफूल हो सकता है, अगर आप कोई भी काम बिना एफर्ट लगाए आसानी से कर रहे हो, इसका मतलब आप सबसे बेहतर वो काम कर सकते हैं। कम से कम सिनेमा और क्रिएटीविटी के क्षेत्र में यह फार्मूला कारगर है। 
 
 
जमशेदपुर से आए फिल्म मेकर अमित शरण डीएवी गल्र्स कालेज में चतुर्थ हरियाणा फिल्म समारोह के दौरान चलाए जा रहे फिल्म मेकिंग कोर्स के पहले दिन विद्यार्थियों को संबोंधित करते हुए।

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