Wednesday, November 17, 2010

मेला श्री कपाल मोचन तीर्थ, जिला यमुनानगर (हरियाणा)

ते श्रुत्‍वा ऋषय: सर्वे तीर्थमाहात्‍म्‍यमुत्तमम् ।
कपालमोचनमिति नाम चक्रु: समागता:  ।।
अनुवाद:
वहां आये हुए सब ऋषियों ने तीर्थ के उत्तम
माहात्‍मय को सुनकर उसका नाम कपाल मोचन रखा।
- वामन महापुराण

हरियाणा के प्राचीन सिन्‍धुवन क्षेत्र में स्थित इस पवित्र स्‍थल पर कार्तिक पूर्णिमा के अवसर पर राज्‍य स्‍तरीय मेले का आयोजन किया जाता है, जिसमे पंजाब, उत्तर प्रदेश, हिमाचल प्रदेश, उत्तरांचल,   चंडीगढ़,   दिल्‍ली से लाखों श्रद्धालु आते हैं और अपनी मनोकामनाएं पूरी करने के लिए इस पवित्र स्‍थल पर कपाल मोचन, ऋण मोचन और सूरज कुंड सरोवरों में स्‍नान करके तीनों लोकों के पापों से मुक्ति प्राप्‍त करते हैं।



पांच दिवसीय राज्‍य स्‍तरीय मेला आज 17 नवंबर को शाही स्‍नान के साथ शुरू हो गया। इसे पंजाबी में पंचबीखी भी कहते हैं। इस मेले का समापन कार्तिक पुर्णिमा के दिन दिनांक 21 नवंबर को होगा। इसी दिन श्री गुरू नानक देव जी की जयंती भी होती है।


हरियाणा की धरती आदि काल से ही ऋषियों-मुनियों की तपस्‍थली रही है। महर्षि दुर्वासा, महर्षि जमदग्नि, महर्षि भृगु, महर्षि च्‍वयन, महर्षि उद्दालक, महर्षि पिप्‍लाद, महामुनि मयंक्‍शाक, महामुनि कपिल एवं महर्षि कृष्‍णाद्वैपायन आदि के आश्रम इसी प्रदेश में थे। स्‍कन्‍ध महापुराण के अनुसार औशनस तीर्थ अर्थात कपाल मोचन द्वैतवन में स्थित था। द्वैतवन, जिसमें बद्री और सिंधु नाम के दो उपवन थे, सरस्‍वती और यमुना के मध्‍यवर्ती प्रदेश में स्थित था। द्वैतवन अपनी पावनता के लिए प्रसिद्ध था। आदि काल में ब्रह्मा जी ने इसी द्वैतवन में यज्ञ करवाने के लिए तीन हवन कुंड बनावाये थे। जो प्‍लक्ष, सोम सरोवर व ऋण मोचन के नाम से प्रसिद्ध हैं।

कपाल मोचन
किवंदिती है एक बार यज्ञ के दौरान एक ब्राह्मण लड़का ऋषियों-मुनियों की सेवा किया करता था। यज्ञ के बाद ऋषियों-मुनियों ने उस लड़के से सरस्‍वती नदी से पवित्र जल लाने को कहा। लेकिन ऋषियों-मुनियों ने भांप लिया कि लड़का जल नहीं लाना चाहता और उनको गुस्‍सा आ गया। ऋषियों-मुनियों के श्राप के डर से लड़का जल तो ले आया लेकिन काफी देर में लौटकर आया था। तब तक ऋषियों-मुनियों ने वहां से प्रस्‍थान की तैयारी कर ली थी। देरी से आने के कारण ऋषियों-मुनियों ने वह जल लड़के के ऊपर दे मारा, जिसमें से कुछ जल यज्ञ हवन कुंड में भी गिर गया। फिर ऋषियों-मुनियों ने उसे श्राप दिया कि तूं कभी गाय के पेट से जन्‍म लेगा, कभी ब्राह्मण रूप में। लड़के ने अपनी गलती के लिए क्षमा याचना की और अपने उद्धार का रास्‍ता पूछा तो ऋषियों-मुनियों ने कहा कि जब तू सातवे जन्‍म में गाय के पेट से पैदा होगा तो हवन कुंड में पड़ा जल ही तेरा उद्धार करेगा। यज्ञ हवन कुंड में ऋषियों द्वारा फैंके गये जल में अमृत रुप पैदा हुआ और ऋषियों-मुनियों ने इसका नाम सोमसर रखा।
समय बीतता गया और कलयुग के प्रभाव के कारण ब्रह्मा अपनी पुत्री सरस्‍वती के प्रति मन में बुरे विचार रखने लगे, जिससे बचने के लिए सरस्‍वती ने द्वैतवन में भगवान शिव शंकर जी से शरण मांगी। सरस्‍वती की रक्षा के लिए भगवान शिव ने ब्रह्मा का सिर काट दिया, जिससे भगवान शिव पर भयंकर पाप लगा और उनके हाथ में ब्रह्म कपाली का निशान हो गया। सब तीर्थों में स्‍नान व दान इत्‍यादि करने से भी वह चिन्‍ह दूर नहीं हुआ। एक दिन घूमते-घूमते भगवान शिव शंकर और माता पार्वती सोमसर तालाब के निकट देव शर्मा नामक ब्राह्मण के घर ठहरे। भगवान शंकर तो समाधि में लीन हो गये, परंतु माता पार्वती को उनके ऊपर लगे ब्रह्म हत्‍या दोष की वजह से नींद नही आ रही थी। रात्रि के समय वहां बंधा गाय का बछड़ा अपनी माता को कहता है कि हे माता, सुबह यह ब्राह्मण मुझे बधिया करेगा, उस समय मैं उसकी हत्‍या कर दूंगा। गाय माता ने कहा कि हे बेटा, ऐसा करने से तुझे बह्म हत्‍या का दोष लग जाएगा। बछड़े ने कहा कि मुझे ब्रह्म हत्‍या के दोष से छुटकारा पाने का उपाय आता है। गाय और बछड़े के बीच हुई ये सारी बातें माता पार्वती ने भी सुन ली थी।
सुबह होने पर ब्राह्मण जब बछड़े को बधिया करने का कार्य शुरु किया। इस दौरान बछड़े ने उस ब्राह्मण की हत्‍या कर दी, जिससे उसे ब्रह्म हत्‍या का घोर पाप लगा, जिससे बछड़े व गाय का रंग काला पड़ गया। इससे गाय बहुत दुखी हुई, लेकिन बछड़े ने कहा कि हे माता, तुम जल्‍दी से मेरे पीछे आओ। गाय और बछड़े ने सोमसर अर्थात औशनस तालाब में पश्चिम दिशा से प्रवेश किया तथा पूर्व दिशा में निकल गए तथा उनका रंग पुन: सफेद हो गया, केवल पांच कीचड़ में तथा सींच पानी से ऊपर रहने के कारण उनका रंग काला ही रह गया। इस सारे दृश्‍य को भगवान शिव और माता पार्वति ने भी देखा। फिर भगवान शिव ने भी तालाब में स्‍नान किया, जिससे उनका ब्रह्म कपाली का दोष दूर हो गया। सरोवर के पश्चिमी तट पर राम आश्रम घाट के नजदीक आज भी गाय और बछड़े की काले रंग की तथापूर्वी तट पर प्राचीन मंदिर में गाय व बछड़े की सफेद प्रतिमाएं स्‍थापित हैं। भगवान शिव को ब्रह्म हत्‍या के दोष कपाली से छुटकारा मिलने के कारण इस सोम सरोवर का नाम कपाल मोचन पड़ गया।
वर्तमान कपाल मोचन तीर्थ का नाम औशनस तीर्थ था, जिसका वर्णन महाभारत और वामन महापुरान में मौजूद है। इन महापुराणों के अनुसार भगवान श्री राम चंद जी जिस समय दंडकारण्‍य में गये तो उन्‍होंने वहां के एक दुरात्‍मा राक्षस का सिर अपने तीव्र धार वाले बाण से काट दिया। वह राक्षस तो मर गया, किंतु उसका कटा हुआ सिर दूर जाकर महोदर नाम के एक तपस्‍वी मुनि की जंघा से चिपक गया और कुछ दिनों बाद जंघा में अत्‍यधिक पीड़ा और गंधपूर्ण स्‍त्राव होने लगा। ऋषियों के कहने के अनुसार मुनि जैसे-तैसे दंडकारण्‍य से चलकर सरस्‍वती के तट पर द्वैतवन में पहुंचे, और जैसे ही उन्‍होने स्‍नान किया, वैसे ही राक्षस का कटा हुआ सिर उनकी जंघा से छूटकर जल में विलीन हो गया। इस घटना की सूचना उन ऋषियों को मिली, जिन्‍होंने उन्‍हें औशनस तीर्थ की यात्रा करने की सलाह दी थी तो वे भी प्रसन्‍न हुए। उन्‍होंने ही औशनस तीर्थ को कपाल मोचन नाम दिया और तब से यह तीर्थ कपाल मोचन के नाम से प्रसिद्ध हो गया।
त्रेता युग में भगवान श्री रामचंद्र जी ने रावण का वध किया, जो सभी शास्‍त्रों के ज्ञाता होने के कारण ब्राह्मण थे, जिससे भगवान श्री राम को ब्रह्म हत्‍या का दोष लगा था। उन्‍होंने भी यहां कपाल मोचन तीर्थ में स्‍नान किया तथा ब्रह्म हत्‍या दोष से मुक्ति पाई।
द्वापर युग मे महाभारत के युद्ध के पश्‍चात श्री कृष्‍ण, पांडवों एवं बलराम के साथ यहां आये। पांडवों को पितृ ऋण से मुक्ति दिलाने के लिए उन्‍होंने कपाल मोच एवं ऋण मोचन सरोवर में स्‍नान किया।
गार्गी गोत्र के दो तपस्‍वी ब्राह्मणों की हत्‍या करने से इंद्र को भी ब्रह्म हत्‍या का दोष लगा। अपने गुरु बृहस्‍पति के बताने पर इंद्र ने भी इस पवित्र सरोवर में स्‍नान कर ब्रह्म हत्‍या के दोष से छुटकारा पाया।
स्‍कन्‍द पुराण के अनुसार कपाल मोचन तीर्थ बहुत प्राचीन और ब्रह्म हत्‍या नाशक, पुत्र, धन आदि सब कामनाएं पूरी करने वाला तीर्थ है। इस तीर्थ में स्‍नान करने से राजा श्रुत के यहां पुत्र पैदा हुआ, जिसका वर्णन स्‍कन्‍द पुराण, हिमादिखण्‍ड, सिंधु पर्वत के बदरीवन में स्थित कपाल मोचन महातम्‍य वर्णन नाम के छठे अध्‍याय में मिलता है।

ऋण मोचन
कपाल मोचन सरोवर के पास ही ऋण मांचन सरोवर है। मान्‍यतानुसार इस तालाब में स्‍नान करने से मनुष्‍य सभी प्रकार के ऋणों से मुक्‍त हो हाता है। महाभारत के युद्ध के बाद धर्मराज युधिष्ठिर ने भगवान श्री कृष्‍ण जी ने पांडवों के साथ व्‍यासपुर में मोचन तीर्थ क नजदीक खुदाई की तथा भूमि से अमृत जल की प्राप्ति हुई। इस सरोवर का नाम उन्‍होंने सत्‍यनारायण सरोवर रखा। यहीं ठहरकर भगवान श्री कृष्‍ण ने पांडवों के साथ यज्ञ किया और पांडवों के पूर्वजों का पिंडदान करवाया, जिससे पांडव पितृ ऋण से मुक्‍त हुए। पितृ ऋण से मुक्‍त होने के कारण यह सरोवर ऋण सरोवर के नाम से प्रसिद्ध हुआ।

सूरज कुंड
दंत कथाओं के अनुसार भगवान श्री राम चंद जी रावण का वध करने के पश्‍चात माता सीता व लक्ष्‍मण सहित पुष्‍पक विमान द्वारा कपाल मोचन सरोवर में स्‍नान करके ब्रह्म हत्‍या के दोष से मुक्‍त हुए और जहां पर वह ठहरे थे, वहां उन्‍होंने एक कुंड का निर्माण करवाया, जिसे आज भी सूरज कुंड के नाम से जाना जाता है। अन्‍य जनश्रुतिनुसार सिंधु वन के इस पवित्र स्‍थन पर माता कुंती ने सूर्य देव की तपस्‍या की, जिसके कारण उन्‍हें कर्ण नामक पुत्र की प्राप्ति हुई। कालांतर में महाभारत के युद्ध के बाद भगवान श्री कृष्‍ण जी पांडवों सहित यहां आए और सूरज कुंड सरोवर में स्‍नान किया।


















सिखों के दशम गुरु गाबिंद सिंह भंगानी के युद्ध के बाद यहां 52 दिन रुके थे। उन्‍होंने कपाल मोचन और ऋण मोचन में स्‍नान किया और अपने अस्‍त्र-शस्‍त्र धोये। कपाल मोचन और ऋण मोचन सरोवरों के बीच एक प्राचीन अष्‍टकौण गुरुद्वारा है। उन्‍होंने कार्तिक पूर्णिमा के दिन गुरु नानक देव जी के पर्व गुरु पर्व को मनाने वालों की सारी कामनाएं पूरी होने का वरदान दिया, जिस कारण आज तक इस अवसर पर यहां लाखों गुरु भक्‍त आकर गुरु पर्व मनाते हैं। गुरु गोबिंद सिंह जी ने कपाल मोचन के महंत को हस्‍त लिखित पट्टा और ताम्र पत्र दिया जो मूल रुप से आज तक उनके वंशज के पास मौजूद है।
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